आजकल भारत में हर दूसरे दिन किसी न किसी बाबा की पोल खुल रही है,कभी सिरसा वाले राम रहीम को सजा होती है, तो कभी राजस्थान के फलाहारी बाबा पकड़े जाते हैं।कभी आसाराम बापू जेल जाते हैं तो कभी दिल्ली में दीक्षित बाबा के आश्रम से लड़कियों को मुक्त कराया जाता है। हर दिन किसी न किसी बाबा की पोल खुल रही है, फिर भी क्या कारण है कि भारत में नास्तिकता का प्रचार, विज्ञान का प्रचार नहीं के बराबर ही है। कुछ मुट्ठी भर लोग वैज्ञानिक सोच के साथ नजर आते हैं। इसका कारण स्पष्ट है, ज्यादातर तर्कशील नास्तिक लोग धर्म-गुरूओं की बुराई करके ही संतुष्ट हो जाते हैं। समाज में अपनी उचित भूमिका निभाने में रुचि नहीं दिखाते।इसी कारण हमें जगह-जगह कीर्तन-कथा,भंडारे और अन्य धार्मिक कार्यक्रम तो नजर आते हैं किंतु वैज्ञानिक सोच पर आधारित गतिविधियों की कमी दिखती है। मुझे इसकी बजाय मानवतावाद अधिक आकर्षक लगता है क्योंकि यह नास्तिकता के समान नकारात्मक नहीं है, तर्कशीलता के समान शुष्क नहीं है और मुक्तचिंतन की तरह अमर्यादित भी नहीं है। मानवतावादी चिंतन में भाव हैं, संवेदनाएं हैं, नैतिकता है, दानशी...