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मार्च, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मानववादी विकास यात्रा

 मानववादी विकास यात्रा के अनुसार केवल लौकिक जगत का ही अस्तित्व है। पारलौकिक जगत की कल्पना केवल मनुष्य के दिमाग की उपज है। इसके कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। स्टीफन हाकिंग जैसे महान वैज्ञानिक प्रमाणित कर चुके हैं कि मृत्यु के बाद कोई जीवन नहीं है। कहीं कोई स्वर्ग-नरक नहीं हैं।  इस पर पंजाबी कवि दर्शन सिंह आवारा ने क्या खूब कहा है:-  "ना कोई जन्नत ना कोई हूर है।  मेरे दिलों भुलेखा दूर है।" इसी तरह पंचकोशीय शरीर की अवधारणा भी अवैज्ञानिक और निराधार है। अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश केवल शब्द-जाल की बकवाद है। भारत के अधिकांश लोग शब्दों के जादूगर होते हैं; ये बहुत बकबक करते हैं; जबकि ज्ञान से शून्य होते हैं।  इसमें कोई तथ्य नहीं है। कुछ लोग स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर आदि भी कहते हैं; लेकिन सत्य यही है कि हमारा केवल एक शरीर है। इसे चाहे आप अन्नमय कोश कहिए या फिर मांसाहारियों के लिए मांसमय कोश कहिए। प्राण, मन, विज्ञान और आनंद इसी के अंदर हैं। जहाँ तक 'मन' की बात है; सोच-विचार करना केवल मस्तिष्क का काम है, दिल सिर्फ रक्त संचार करता है।...

राहुल सांकृत्यायन का इस्लाम

 आज ई-पुस्तकालय की वेबसाइट पर भ्रमण करते-करते हिंदी के सुविख्यात लेखक राहुल सांकृत्यायन की लिखी पुस्तकों का अवलोकन करने लगा। तभी मेरी नजर उनकी एक पुस्तक "कुरान सार" (1923 में लिखित) पर पड़ी। मैंने जिज्ञासावश उसको सरसरी नजर से पढ़ना शुरू किया। मुझे राहुल सांकृत्यायन जी के नास्तिक विचारों का भली-भांति पता है। मैं उनकी पुस्तकों "तुम्हारी क्षय", "भागो नहीं, दुनिया को बदलो", "मानव की कहानी" से काफी प्रभावित रहा हूँ।  इसी कारण "कुरान सार" में भी मैं उनके तर्कशील विचारों का अनुमान लगा रहा था। लेकिन इसमें तो मुझे दूसरे ही राहुल नजर आए। उन्होंने इस पुस्तक में इस्लाम का वर्णन पारंपरिक इस्लामिक धारा में ही किया है। कहीं एक भी पंक्ति ढूँढ़े नहीं मिली; जिसमें कहीं थोड़ी-बहुत आलोचना लिखी गई हो। हो सकता है उस समय राहुल जी को इस्लाम की उतनी जानकारी न रही हो; जितनी हमें आज इन्टरनेट के युग में मिल रही है। आज यूट्यूब पर एक से बढ़कर एक एक्स मुस्लिम चैनल हैं; जो बेरहमी से इस्लाम के हिंसक और घातक रूप को हमारे सामने उजागर करते हैं। फिर भी राहुल सांकृत्यायन जै...