आज ई-पुस्तकालय की वेबसाइट पर भ्रमण करते-करते हिंदी के सुविख्यात लेखक राहुल सांकृत्यायन की लिखी पुस्तकों का अवलोकन करने लगा। तभी मेरी नजर उनकी एक पुस्तक "कुरान सार" (1923 में लिखित) पर पड़ी। मैंने जिज्ञासावश उसको सरसरी नजर से पढ़ना शुरू किया। मुझे राहुल सांकृत्यायन जी के नास्तिक विचारों का भली-भांति पता है। मैं उनकी पुस्तकों "तुम्हारी क्षय", "भागो नहीं, दुनिया को बदलो", "मानव की कहानी" से काफी प्रभावित रहा हूँ।
इसी कारण "कुरान सार" में भी मैं उनके तर्कशील विचारों का अनुमान लगा रहा था। लेकिन इसमें तो मुझे दूसरे ही राहुल नजर आए। उन्होंने इस पुस्तक में इस्लाम का वर्णन पारंपरिक इस्लामिक धारा में ही किया है। कहीं एक भी पंक्ति ढूँढ़े नहीं मिली; जिसमें कहीं थोड़ी-बहुत आलोचना लिखी गई हो। हो सकता है उस समय राहुल जी को इस्लाम की उतनी जानकारी न रही हो; जितनी हमें आज इन्टरनेट के युग में मिल रही है। आज यूट्यूब पर एक से बढ़कर एक एक्स मुस्लिम चैनल हैं; जो बेरहमी से इस्लाम के हिंसक और घातक रूप को हमारे सामने उजागर करते हैं। फिर भी राहुल सांकृत्यायन जैसा अनुभवी साहित्यकार इस्लाम के इन तथ्यों से अपरिचित रहा होगा; यह स्वीकार करना कठिन लगता है।
इस पुस्तक की वर्णन-शैली से ऐसा लगता है कि इसका लेखक कोई कट्टर मुल्ला हो। राहुल जी ने इस पुस्तक में यत्र-तत्र सर्वत्र इस्लाम का गुणगान किया है और गलती से भी इस्लाम की रत्तीभर भी नुक्ताचीनी नहीं की है। इस भीरूता का क्या कारण हो सकता है? क्या यह उनकी मार्क्सवादी कामरेड होने की विवशता थी? क्योंकि कामरेड नास्तिक होते हुए भी इस्लाम की बुराई करने से बचते आए हैं। यह उनकी वैश्विक नीति रही है। जबकि इस्लाम जैसी विस्तारवादी विषबेल जिस पेड़ पर गिरती है उसे ही सुखा डालती है। हो सकता है भारत पर लंबे इस्लामी शासन से पैदा धिम्मीपने का यह असर हो, जिसमें गैर-मुसलिम लोग इस्लाम की चाटुकारिता करके अपना अस्तित्व बचाने की प्रवृति विकसित करते हैं।
खैर, मुझे राहुल जी के इस्लाम संबंधी विचार जानकर बड़ा ताज्जुब हुआ और कुछ धक्का सा भी लगा कि जिसे मैं अपने वैचारिक नायकों में से एक समझता था, वह एक साधारण कामरेड निकला। पुस्तक-निवेदन में राहुल सांकृत्यायन कहते हैं कि वे हिंदुओं के लिए यह पुस्तक लिख रहे हैं। फिर भी वे इस्लामी प्रचारक की भांति मनमोहक रूप पेश करते हैं। इसकी क्या जरूरत थी?
पाठकों की ज्ञान वृद्धि के लिए कुछ उदाहरण देना चाहता हूँ:-
* पहले अध्याय में वे मुहम्मद को "महात्मा मुहम्मद" कहते हैं।
(हो सकता है यह 'महात्मा' शब्द पैगंबर का हिंदी पर्यायवाची के रूप में लिखा हो। फिर भी आज हम जानते हैं कि मुहम्मद लुटेरा, बलात्कारी, बच्चों का यौन-शोषणकर्ता (pedophile), हत्यारा और निरंकुश तानाशाह था। जिसे हम महात्मा कदापि नहीं मान सकते हैं।)
* 'इस्लाम का प्रचार और कष्ट' उप-शीर्षक में वे वही पारंपरिक इस्लामिक नजरिया प्रस्तुत करते हैं कि मक्के वालों ने मुहम्मद और उसके अनुयायियों पर बहुत जुल्म किया। जबकि सच यह है कि मक्का निवासियों ने बहुत समय तक मुहम्मद की बदतमीजियों को सहन किया। मुहम्मद सरेआम उनके देवी-देवताओं का मजाक उड़ाता था; उन्हें झूठा कहा करता था। फिर भी वह 12 वर्ष सुरक्षित रहता रहा। मक्का के लोग बहुदेववादी थे, वे अलग-अलग देवी-देवताओं को पूजते थे। इस कारण बहुदेववादी बहुत सहनशील होते हैं। उन्हें मुहम्मद के निराकार ईश्वर की आराधना करने पर कोई भी आपत्ति नहीं थी। वे तो इतना चाहते थे कि मुहम्मद उनकी पूजा पद्धति की बुराई न करे।
* 'मृत्यु' उप-शीर्षक में वे लिखते हैं:- "मदीना में वे अभी अधिक दिन तक शांतिपूर्वक विश्राम न कर सके थे कि वहाँ भी कुरैश उन्हें कष्ट पहुँचाने लगे। अंत में आत्म-रक्षा का अन्य उपाय न देख; कुरैश और उनकी कुमंत्रणा में पड़े हुए मदीना-निवासी यहूदियों के साथ उन्हें अनेक युद्ध करने पड़े; जिनकी समाप्ति "मक्का-विजय" और काबा को मूर्ति रहित करने में हुई। "
वाह राहुल जी! आपने कितने संक्षेप में बात निपटा दी। आप ये तथ्य बताना जानबूझकर भूल गए कि बद्र की लड़ाई मुसलमानों ने मक्का वालों पर थोंपी थी। मक्का वासी तो अपने व्यापारिक काफिले का रूट बदलकर मामला टालना चाहते थे। जबकि मुहम्मद और उसके 'शांतिदूत' युुद्ध करने पर आमादा थे। शुरुआत में लूटपाट ही मुसलमानों की मुख्य आजीविका थी। राहुल सांकृत्यायन जी, आपने मुहम्मद द्वारा बनू कुरैजा के यहूदियों के नरसंहार का वर्णन नहीं किया, जिसमें लगभग 600 यहूदी पुरुष एक लाईन में बिठाकर मार डाले गए और उनकी औरतों-बच्चों को गुलाम बना लिया गया था।
काबा को मूर्ति-रहित क्यों किया गया? क्या मूर्ति-पूजकों की धार्मिक भावनाओं का कोई मूल्य नहीं है?
* 'महात्मा मुहम्मद के विवाह' (पृष्ठ 44) उप-शीर्षक में वे मुहम्मद का बचाव करते हुए कहते हैं-- "कई कारणों से मजबूर होकर महात्मा को (प्राय:) दश विवाह और करना पड़ा; किंतु यह सब 53 वर्ष की अवस्था के बाद हुए।" राहुल सांकृत्यायन ने मुहम्मद द्वारा अपने दत्तक पुत्र जैद की पत्नी से विवाह को इस्लामिक कुतर्कों से न्यायोचित सिद्ध किया। जबकि इस चक्कर में मुहम्मद ने "बच्चे गोद लेने" की अच्छी परंपरा ही खत्म करवा दी थी।
आएशा की 6 वर्ष की अल्पायु में 54 वर्ष के मुहम्मद से विवाह के प्रकरण को राहुल जी इस तरह से पेश करते हैं:- "अबूबकर के आग्रह ने आएशा से ब्याह करने पर मजबूर कर दिया।"
वाह राहुल जी ! मुसलमानों से इतना डर गए कि आपने सच का गला ही घोंट डाला!आखिर कोई पिता अपनी 6 साल की बच्ची का ब्याह 54 साल के अधेड़ से क्यों कराना चाहेगा? अबूबकर ने तो शुरू में इस पर आपत्ति की थी। बाद में मुहम्मद के दबाव में उसे "हाँ" कहनी पड़ी। कोई पूछे कि खदीजा के रहते हुए मुहम्मद की हिम्मत क्यों नहीं पड़ी दूसरी शादी करने की? कारण स्पष्ट है कि उस समय वह खदीजा के टुकड़ों पर पलता था। खदीजा एक सफल व्यापारी थी; जबकि मुहम्मद के पास कोई काम-धंधा नहीं था। वह इतना लापरवाह था कि खदीजा की मौत के बाद वह उसका व्यापार नहीं संभाल सका और सारा व्यापार चौपट हो गया।
खैर, सच्चाई यह है कि गैर-मुस्लिमों पर हमले करके उन्हें हराकर मुहम्मद को बहुत लूट का माल मिला। इसमें धन-दौलत, भेड़-बकरियों, ऊँटों के अलावा औरतें भी होती थीं। मुहम्मद ने 20% लूट अपने लिए आरक्षित कर ली। साफिया के यहूदी पति और पिता की हत्या करके उसी रात मुहम्मद ने उसके साथ सुहागरात मनाई।
आएशा से विवाह के लिए मुहम्मद को नहीं बल्कि आएशा के पिता अबूबकर को मजबूर किया गया था। इसी प्रकार हफ्शा की नौकरानी मारिया से मुहम्मद की हमबिस्तरी के किस्से को राहुल जी "शहद का किस्सा" करार देते हैं।
राहुल जी दसवें बिन्दु (पृष्ठ 138) में बेशर्म मुल्लाओं की तरह दावा करते हैं कि मुहम्मद ने कुरान में औरतों को अधिकार दिए हैं। जबकि इस्लाम ने औरत को बुर्के और जिहालत के सिवाय कुछ नहीं दिया है। इस्लाम ने औरत को सिर्फ भोग्या और बच्चे पैदा करने की मशीन बना छोड़ा है।
निष्कर्ष:-
इस प्रकार हम देखते हैं कि राहुल जी स्पष्ट नास्तिक होते हुए भी यहाँ इस्लाम का एकतरफा वर्णन करते हैं। यह एक तरह की साहित्यिक बेईमानी है। यह भी हो सकता था कि पहले मुस्लिम पक्ष रख दिया जाता; फिर उसकी सम्यक आलोचना और तर्कशीलता के नजरिए से इसका विश्लेषण कर दिया जाता। लेकिन राहुल जी इतना साहस नहीं जुटा पाए। - मनोज मलिक 'ह्यूमनिस्ट'

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