मानववादी विकास यात्रा के अनुसार केवल लौकिक जगत का ही अस्तित्व है। पारलौकिक जगत की कल्पना केवल मनुष्य के दिमाग की उपज है। इसके कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। स्टीफन हाकिंग जैसे महान वैज्ञानिक प्रमाणित कर चुके हैं कि मृत्यु के बाद कोई जीवन नहीं है। कहीं कोई स्वर्ग-नरक नहीं हैं।
इस पर पंजाबी कवि दर्शन सिंह आवारा ने क्या खूब कहा है:-
"ना कोई जन्नत ना कोई हूर है।
मेरे दिलों भुलेखा दूर है।"
इसी तरह पंचकोशीय शरीर की अवधारणा भी अवैज्ञानिक और निराधार है। अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश केवल शब्द-जाल की बकवाद है। भारत के अधिकांश लोग शब्दों के जादूगर होते हैं; ये बहुत बकबक करते हैं; जबकि ज्ञान से शून्य होते हैं।
इसमें कोई तथ्य नहीं है। कुछ लोग स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर आदि भी कहते हैं; लेकिन सत्य यही है कि हमारा केवल एक शरीर है। इसे चाहे आप अन्नमय कोश कहिए या फिर मांसाहारियों के लिए मांसमय कोश कहिए। प्राण, मन, विज्ञान और आनंद इसी के अंदर हैं। जहाँ तक 'मन' की बात है; सोच-विचार करना केवल मस्तिष्क का काम है, दिल सिर्फ रक्त संचार करता है।
अच्छा होगा कि हम आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग-नरक, मोक्ष आदि काल्पनिक बातों को छोड़कर इस पृथ्वी को बेहतर बनाने की बात करें। हम इस धरती को जन्नत बनाने की कोशिश करें। हम गरीबी, बेकारी, भुखमरी, तनाव, अवसाद आदि को कम करने में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाएं। आज विज्ञान की बदौलत मनुष्य की आयु दुगुनी हो चुकी है; संचार परिवहन के साधन सुलभ हो चुके हैं। अब विज्ञान की एक शाखा मनोविज्ञान (Psychology) मानव-व्यवहार का सूक्ष्म अवलोकन करके मानव-प्रसन्नता को अधिकतम करने में लगी हुई है। आज हमें ढोंगी गुरुओं की जगह मनोचिकित्सकों की आवश्यकता है। मंदिर-मस्जिद की जगह स्कूल-कालेज की जरूरत है। वेद-बाइबिल-कुरान की जगह कम्प्यूटर की जरूरत है। ईश्वर भरोसे रहने की बजाय जीवन बीमा कराने की जरूरत है। गाय और गंगा को पवित्र मानने की बजाय उन्हें उपयोगी पशु और नदी मानकर उसकी उचित संभाल करने की जरूरत है। आनंद को भोग या स्वर्ग में ढूंढ़ने की बजाय भूखे को रोटी देकर जरूरतमंद की मदद करके पाने की जरूरत है। कुल मिलाकर हमें परलोक की फिक्र छोड़कर इस लोक की फिक्र करने की जरूरत है।
धार्मिक लोगों के विपरीत, मानववादी यह नहीं मानते कि यह संसार केवल दुखों से भरा हुआ है। हम मानते हैं कि इस संसार में पर्याप्त सुख भी उपलब्ध हैं। मानववादियों का विश्वास है कि एक दिन दुनिया युद्ध और गरीबी से मुक्त हो जाएगी। मानववादियों का यह स्पष्ट मानना है कि "कोई देवता हमें बचाने नहीं आएगा; हमें खुद अपने आपको बचाना है। (दूसरा ह्यूमनिस्ट मैनिफैस्टो 1973)
मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि हमारे धर्मग्रंथों में सब कुछ बुरा है, त्याज्य है। इनमें बहुत से सुन्दर मानववादी विचार मिलते हैं। जैसे स्वर्णिम नियम-- दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार कीजिए जैसा आप खुद के लिए चाहते हैं (बाइबिल - मैथ्यू; महाभारत - शांति पर्व) ये विचार आज भी प्रासंगिक और लाभदायक हैं। पर इन्हें विवेक-बुद्धि से ढूँढ़ना पड़ता है। इनका अधिकांश हिस्सा आज अनुपयोगी और अप्रासंगिक हो चुका है। कुछ हठधर्मी आज माचिस, लाइटर के युग में भी अरणी की अग्नि को ही पवित्र समझते है। आज भी कुछ लोग रेलगाड़ी के दौर में नंगे पैर पैदल ही चल रहे हैं। आज भी कुछ लोग सूक्ष्मदर्शी (microscope) और दूरदर्शी (telescope) के जमाने में राशिफल (horoscope) देखते हैं। आज भी कुछ लोग टीकाकरण के समय में बालकों को नजर का काला टीका लगाते हैं।
हालांकि यह उनका अपना चुनाव है। उन्हें अपना जीवन अपने ढंग से जीने का लोकतांत्रिक अधिकार है। परंतु इसे उनकी समझदारी कतई नहीं कहा जा सकता है। -- मनोज मलिक

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