पाकिस्तान के करक जिले में मौलवी के भड़काऊ भाषण देने के बाद एक हिंदू मंदिर को सरेआम तोड़ा गया और फिर उसे जला दिया गया। (31 दिसंबर 2020) यह सब पुलिस-दस्ते की आँखों के सामने हुआ। इस पर भारत के कुछ छद्म-सेकुलर लोग कह रहे हैं कि:- "पाकिस्तान की नहीं भारत की बात करो। क्या भारत के मुसलमान ने कोई मंदिर तोड़ा?"
यह क्या बात हुई? भई खबर पाकिस्तान की है तो बात भी पाकिस्तान की होगी ना! अगर इसके पीछे यह आशय है कि हमें पाकिस्तान की तरह सांप्रदायिक और धार्मिक कट्टरवाद से ग्रस्त नहीं होना है, तब तो ठीक है; लेकिन यदि इसका आशय मुस्लिम सांप्रदायिकता से ध्यान हटाना और केवल हिंदू सांप्रदायिकता को कोसना ही है तो यह बहुत खतरनाक बात है। यह एक ऐसा रुझान है जो बार-बार दिखलाई पड़ता है। ये लोग संघ को गालियाँ देंगे, ब्राह्मणवाद को भला-बुरा कहेंगे, मगर क्या मजाल है कि कभी भूलकर भी इस्लामिक कट्टरवाद की निंदा या आलोचना करें!
भारत में मुस्लिमों और इस्लाम का बचाव करना ही सेकुलरिज्म समझा जाता है। यह विचित्र "भारतीय सेकुलरिज्म" उस सच्चे सेकुलरिज्म से बिल्कुल अलग और विरोधाभासी है जो मानता है कि राज्य और मजहब दोनों अलग-अलग चीजें हैं और दोनों के कार्यक्षेत्र अलग-अलग हैं। राज्य को किसी भी मजहबी मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। और यदि कोई भी मजहब कानून-व्यवस्था में रुकावट पैदा करे तो बिना किसी भेदभाव के कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए जो भी जरूरी कदम हों, वे उठाए जाएं। सेकुलरिज्म बिना भेदभाव के हर नागरिक की सुरक्षा को सुनिश्चित करता है। सेकुलरिज्म हर मजहब की कट्टरता का विरोधी और विज्ञान का समर्थक होता है।
इस विचित्र "भारतीय सेकुलरिज्म" के इस "हिंदू-विरोध" और "मुस्लिम-रक्षा" के रुझान का अनिवार्य परिणाम यह हुआ कि हिंदू भी मुस्लिम सांप्रदायिकता की प्रतिक्रिया में धीरे-धीरे सांप्रदायिक होता चला गया और सेकुलरिज्म से दूर होता चला गया। सेकुलरिज्म में, स्वाभाविक रूप से, किसी देश के बहुसंख्यक समुदाय पर ही ज्यादा सवाल उठाए जाते हैं और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का ख्याल रखना होता है। यह बात आसानी से समझ में आती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अल्पसंख्यक समुदाय की सांप्रदायिकता को सहन किया जाए, उसे पोषित किया जाए।
भारत में सेकुलरिज्म को यदि बचाना है तो बिना किसी पक्षपात के सभी मजहबों की स्वस्थ आलोचना का, विशेष रूप से, इस्लामिक कट्टरवाद की आलोचना का माहौल तैयार करना होगा। एक समुदाय की सांप्रदायिकता के बढ़ने से दूसरे समुदाय की सांप्रदायिकता भी भड़क उठती है और फिर परिस्थितियाँ काबू से बाहर होती जाती हैं। 1947 से पहले भी ऐसा ही हुआ था। महात्मा गांधी के खिलाफत आंदोलन को समर्थन दिए जाने से मुस्लिम सांप्रदायिकता को मान्यता मिली और कुछ साल बाद उसकी प्रतिक्रिया हिंदुओं में देखने को मिली। हिंदू भी उत्तरोत्तर सांप्रदायिक होता गया। हालांकि कट्टरता के मामले में "बहुदेववादी हिंदुत्व" इतिहास में कभी भी "एकेश्वरवादी इस्लाम" की बराबरी नहीं कर पाया है। क्योंकि बहुदेववादी मजहब अपनी प्रकृति से ही तुलनात्मक रूप से अधिक सहिष्णु होते हैं। जबकि एकेश्वरवादी मजहब ज्यादा कट्टर और असहिष्णु होते हैं।
इस मौलिक अंतर को समझे बिना हम सच्चे सेकुलरिज्म को लागू नहीं कर सकते हैं और हमेशा पक्षपात की संभावना बनी रहती है।
यहां हमें यह भी ध्यान रखना है कि एक मजहब की आलोचना का मतलब दूसरे मजहब से सहमति हरगिज नहीं है। इस तरीके से सभी प्रकार की सांप्रदायिकता पर प्रहार करते हुए जीवन पर मजहब की पकड़ कमजोर होगी और कोई भी मुद्दा सांप्रदायिक झगड़े में तब्दील नहीं होगा।
~ मनोज मलिक
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