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आचार्य रजनीश के तीन रूप

 आचार्य रजनीश (1931-1990) रजनीश का जन्म मध्य प्रदेश में 11 दिसंबर 1931 में हुआ। उनका बचपन का नाम चंद्रमोहन जैन था। उनकी पहचान प्रखर वक्ता, दार्शनिक और विवादास्पद धार्मिक गुरु के रूप में की जाती है। रजनीश की लच्छेदार बातें, उनकी "संभोग से समाधि" जैसी पुस्तकों में हिंदी भाषी पाठक की जिज्ञासा आज भी पाई जाती है। ओशो रजनीश के बौद्धिक-शस्त्रागार में अनेक शस्त्र हैं, जिनका आम पाठक शिकार बन जाता है। कोई मुक्त-सैक्स में अटक जाता है, कोई संगठित रिलीजन के विरोध, तर्कशीलता और नास्तिकता में फँस जाता है, तो कोई मेडिटेशन, नृत्य, संगीत, कुंडलिनी जागरण आदि से आकर्षित होकर रजनीश का चेला बन जाता है। इस प्रकार आज भी आचार्य रजनीश अनेक लोगों के लिए प्रासंगिक बने हुए हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में पाठकों को सावधान करने हेतु यह लेख लिखा है ताकि रजनीश की लुभावनी बातों से प्रभावित होकर लोग उनके अंधभक्त न बनें, अपने दिमाग को रजनीश के आगे गिरवी न रखें और मानसिक शांति के भ्रम में न फँसें।

रजनीश के जीवन-वृत्त पर नजर डालने से स्पष्ट ज्ञात होता है कि उनके तीन रूप हैं:- 

1. आचार्य रजनीश (1970 तक):- इस समय रजनीश एक विद्रोही के रूप में हमारे सामने आते हैं। जबलपुर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर बने। लेकिन कुछ समय बाद ही उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और पूरे भारत में व्याख्यान देने लगे। वे संगठित रिलीजन का विरोध करते है। वे सभी धर्मों को डर और लालच पर आधारित मानते थे। धर्म की पुरानी परंपराओं को मरे हुए, पुराने, गले-सड़े रिवाज कहते थे। फ्री-सैक्स की बात करते हैं। इस विषय पर आमतौर पर भारतीय समाज में बात ही नहीं की जाती है। वे ईश्वर और परलोक को नकारते हुए इस संसार में सुख से रहने की बात करते हैं। वे गरीबी को महिमामंडित करने की तीखी आलोचना करते हैं। इस प्रकार वे प्रगतिशील विचारधारा के निकट दिखलाई देते हैं। 

2. भगवान रजनीश (1970 से 1989) :- इस कालखंड में रजनीश अपनी कही बातों के विपरीत व्यवहार करने लगते हैं। ईश्वर का खंडन करने के बावजूद वे खुद को ही भगवान घोषित कर देते हैं। वे अधिक से अधिक शिष्य बनाने की कोशिश करते हैं; फिर इन्हीं शिष्यों के बल पर विलासितापूर्ण जीवन जीने लगते हैं। नवसंन्यास में दीक्षित होने वालों को नये नाम के साथ-साथ भगवा चोगा, माला और गले में रजनीश का लाकेट पहनना होता है। रजनीश के नवसंन्यासियों को ब्रह्मचर्य का पालन करने की कोई जरूरत नहीं थी। इसके विपरीत उन्हें सांसारिक जीवन को भरपूर ढंग से जीने की प्रेरणा दी जाती थी। अपनी भाषण-कला और वाक-चातुर्य का दुरुपयोग अपने भक्तों को ठगने के लिए करने लगते हैं। वे मेडिटेशन के साथ संगीत और नृत्य का समावेश करके इसे आकर्षक बनाते हैं। संगठित रिलीजन का विरोध करने वाले रजनीश अब नया रिलीजन "रजनीशीज्म" शुरू करते हैं। उन्होंने दावा कि उन्हें 21 वर्ष की आयु में यानी 1952 में "साक्षात्कार" हो चुका था। हालांकि उन्होंने पहले इसके बारे में कुछ नहीं बताया। अपने शिष्यों के संसाधनों पर भगवान रजनीश ने खूब ऐश भी की। 1981 में ओरेगोन, यू. एस. में जाकर रजनीशपुरम शहर की स्थापना की। लेकिन स्जस्थानी लोगों से विवाद के कारण आश्रम छोड़कर जाना पड़ा। जब उन्हें अमेरिका में गिरफ्तार किया गया, तब उनके पास 93 राल्स रायस कारें, 5 हवाई जहाज, 2 हेलिकॉप्टर, 10 लाख डॉलर की घड़ियाँ, ब्रेसलेट आदि थे। 



3. ओशो (1989 से मृत्युपर्यंत) :- इस तीसरी और अंतिम अवस्था में रजनीश एक साधारण गाडमैन बन गए। अमेरिका से लौटकर पूना आश्रम में प्रवचन शुरू किए। इन्होंने अपनी वक्तृत्व कला के दम पर अपने भक्तों को अभिभूत कर लिया और रहस्यवाद कायम रखने वाली शब्दावली का सहारा लिया। ओशो नाम धारण किया और अपने अनुयायियों को अपना अंधभक्त बनाया। आज भी बहुत बड़ी संख्या में रजनीश को लोग पढ़कर उनसे प्रभावित होते हैं। लेकिन वे तार्किक चिंतन नहीं कर पाते हैं कि आखिर रजनीश की बातों का अर्थ क्या है। आज भी उसी रहस्यात्मक शैली में बातें की जाती है। मेडिटेशन के नाम पर लोगों को भ्रमित किया जाता है। रजनीश की समाधि पर लिखा गया, "वह कभी जन्मा नहीं, कभी मरा नहीं, केवल कुछ समय के लिए इस पृथ्वी पर आया।" यह ठगी का व्यापार जो रजनीश ने स्वयं आरंभ किया था, वह अब भी यथावत चालू है।

रजनीश अपनी असाधारण प्रतिभा से समाज को एक नई दिशा दे सकते थे। लेकिन वे विलासिता और लोकप्रियता के मोह में फँस कर रह गए। उन्होंने अपने प्रभावशील व्यक्तित्व के दम पर लोकप्रियता तो हासिल कर ली; परंतु वे समाज में कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं दे पाए। 

(मनोज मलिक)

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