आज मैं शाम को सैर पर निकला तो दूर से भजन-कीर्तन की आवाज सुनाई दी। आज स्कूल से लौटते हुए मैंने आसाराम के भक्तों की, या साफ शब्दों में कहें तो अंधभक्तों का, एक बड़ा ट्राला देखा था, जिस पर बड़े-बड़े शब्दों में "आत्मसाक्षात्कार दिवस" लिखा हुआ था। इस भजन-कीर्तन में आसाराम के स्टाइल में "हरी ओम" की आवाज सुनकर मैं समझ गया कि यह उसी के भक्तों का कार्यक्रम है। मैंने तो सैर ही करनी थी, तो सोचा कि आज इन्हीं का निरीक्षण कर लिया जाए। मैं उनकी ओर बढ़ चला। सैक्टर 23 के सनातन धर्म मंदिर के सामने मैंने देखा कि वही बड़ा ट्राला सुंदर ढंग से सजाया हुआ था और आसाराम के कथित आत्मसाक्षात्कार दिवस को उसके भक्त धूमधाम से मना रहे थे। ट्राले पर बैठकर स्त्री-पुरूष उसके गुणगान के गीत गाए जा रहे थे। पीछे-पीछे लगभग 100-150 लोग पैदल चल रहे थे। उनके पीछे आठ-दस कारें चल रही थी, जिन पर आसाराम और रामचंद्र के चित्र रक्खे हुए थे। मुझसे इस संत-वेष में छिपे बदमाश का समारोह मनाते हुए इन अंधभक्तों पर काफी गुस्सा आया। मैं इन अक्ल के अंधों पर हैरान हो रहा था। एक बार सोचा कि एक-दो से पूछूं कि, "क्या भैया, जब अक्ल बँट रही थी, तब कहाँ सोये पड़े थे। अरे बलात्कार के आरोप में जेल पड़े व्यक्ति की तुलना श्रीराम से कर रहे हो? क्या अभी भी तुम्हारी आँख नहीं खुली?" फिर उनकी संख्या-बल देखकर ठिठक गया। पास में दो-तीन बालक खड़े थे। उन्हीं को समझाने लगा कि जिसको ये लोग अपना गुरू मानते हैं, वह तो कई सालों से जेल में बंद है। पता नहीं बच्चे मेरी बात कितनी समझे। मैं आगे चल पड़ा। कुछ देर जुलूस का और निरीक्षण किया, फिर वह राह छोड़कर रिहायशी गलियों में घूमता रहा। इन धार्मिक समूहों के जन-समर्थन और अकूत संसाधनों को देखकर मेरा दिल बैठने लगा। मुझे ह्यूमनिस्ट यूनिट का कार्य बहुत छोटा और प्रभावहीन-सा लगने लगा। इन धार्मिक संप्रदायों के पास कितने भक्त हैं, विशाल आश्रम हैं, साल में बड़े-बड़े कार्यक्रमों का आयोजन कर डालते हैं। इनका मुकाबला करना बहुत मुश्किल है।
मैं दो-तीन साल से बच्चों पर मेहनत कर रहा हूँ, तब जाकर आठ-दस बच्चों को मानववाद और वैज्ञानिक सोच से जोड़ पाया हूँ, लेकिन अतना समाज कितना बड़ा है। यहाँ आसाराम जैसे अपराधी जेल में रहते हुए भी भक्तों पर अपना कितना प्रभाव छोड़े हुए हैं। मुझे इनकी कार्य-प्रणाली का अध्ययन करके अपने तरीके में कुछ बदलाव करना चाहिए। लेकिन इनकी अंधश्रद्धा, गुरू की कृपा, जिनके कारण इनके भक्त एकमत हैं, और अपना तन-मन-धन सब समर्पित कर देते हैं, आदि बातें हम हरगिज नहीं अपना सकते। इन्हीं बातों का तो हम विरोध करते हैं। लेकिन संगठन के दृष्टिकोण से यही इनकी ताकत है। हमारे पास भी ऐसा कुछ होना चाहिए। ऐसा कुछ जिस पर मानववादियों की अटूट आस्था हो, और सब उस पर एकमत हो, जिसके लिए सब अपना तन-मन-धन समर्पित कर दें।
क्या ऐसा कोई तत्व है हमारे पास? हाँ, है। मानवता ऐसा ही तत्व है, जिस पर हम मानववादी लोग श्रद्धा रख सकते हैं, जिस पर हम समर्पित हो सकते हैं। यह ठीक है कि अपने पास गुरू-कृपा जैसा रहस्यमयी तत्व नहीं है। लेकिन हमारे पास इसके विकल्प के रूप में यह मानववादी समझ है कि मनुष्यों की कृपा से ही यह धरती इतनी सुव्यवस्थित है, और मनुष्यों की ही कृपा से अपराध, रोग, ईर्ष्या-द्वेष आदि व्यक्तिगत दोष दूर हो सकते हैं। कुछ दुर्जनों की अपकृपा ही युद्धों और दुखों का कारण बनती है। हम ईश-कृपा या गुरू-कृपा जैसे मनोभ्रम में जीवित नहीं रह सकते। हमें पता है कि गुरू के नाम पर कुछ गुरू-घंटाल भी होते हैं। ये कथित गुरू अपने अंधभक्तों को पालतू गाय की तरह दुहते रहते हैं। हम अच्छी तरह जानते हैं कि लोकतंत्र, मानवाधिकार, समानता, स्वतंत्रता आदि जीवन-मूल्यों के लिए हमारे पुरखों ने अर्थात मनुष्यों ने बहुत कष्ट उठाए हैं, संघर्ष किए हैं। मनुष्यों ने ही रेल, वायुयान, टेलीफोन, कंप्यूटर आदि बनाए हैं। ये चीजें हमें किसी गुरू-कृपा से नहीं मिली हैं। आज जो युद्धों और रोगों में कमी आई है, वह मनुष्यों के प्रयासों का परिणाम है।
यह ठीक है कि कुछ लोग बहुत निकृष्ट व्यवहार करते हैं, कुछ अपने ही जीवन-साथी या मित्र को धोखा देते हैं, यहाँ तक कि हत्या भी कर डालते हैं। कुछ अपने ही माता-पिता को वृद्धाश्रम में भेजते हैं, भ्रष्टाचार मिलावट, नशे का कारोबार करते हैं। इन बातों से मन निराश होने लगता है। लेकिन इन बातों से हमारा मानवता पर से भरोसा नहीं उठना चाहिए। मानवता पर हमारा भरोसा अक्षुण्ण रहना चाहिए। क्योंकि अधिकांश मनुष्य अच्छे हैं, कानून को मानने वाले हैं, घर-परिवार, मित्रता आदि के प्रति जिम्मेदार हैं।
महात्मा गांधी ने सही कहा था कि "हमें मानवता में अपना विश्वास नहीं खोना चाहिए। कुछ पानी गंदा होने से समुद्र खराब नहीं हो जाता है।"
हाँ, मानवता ही हम मानववादियों की ताकत होना चाहिए।
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