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इमरान प्रतापगढ़ी : सेकुलरिज्म के नाम पर एक धब्बा

 आज इमरान प्रतापगढ़ी को यूट्यूब पर सर्च किया। कई दिनों से न्यूज चैनल डिबेट्स में इमरान प्रतापगढ़ी के नाम का जिक्र आ रहा था। इसका संबंध हाल ही मारे गए बदमाश अतीक अहमद के साथ बताया जा रहा है। तभी मुझे याद आया कि एक बार डा. रणजीत ने इमरान प्रतापगढ़ी की कोरोना-काल से संबंधित एक कविता को "मानववादी गीत एवं कविताएं" में शामिल करने की अनुशंसा की थी। लेकिन मैंने पाया कि इस कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य की सोच कहीं से भी सैकुलर नहीं है। इसके विपरीत वे हिंदुओं से धार्मिक द्वेष रखने वाले मुस्लिम कट्टरपंथी ही हैं। 

एक कविता "बोलो क्या-क्या झुठलाओगे" में उनकी यह कट्टर इसलामी सोच स्पष्ट रूप से उजागर हो गई। ये कविता किसी सच्चे सैकुलर मानववादी की नहीं लगती, बल्कि एक कट्टर मोहम्मडन की लिखी लगती हैं। इनमें सांप्रदायिक सद्भाव नहीं, बल्कि "हम बनाम तुम" (We Vs You) की अभिव्यक्ति हो रही है। ऐसे ही कथित सैकुलरों के कारण आम हिंदू सांप्रदायिकता की गोद में जाकर बैठ गया है। 

इसने लालकिले और ताजमहल को तो गिना दिया; लेकिन ये बताना भूल गए कि अजंता-ऐलोरा, स्वर्ण मंदिर अमृतसर, अशोक स्तंभ, इंडिया गेट, संसद-भवन, विक्टोरिया मेमोरियल, हवामहल जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, ग्वालियर के किले, रानी की वाव - गुजरात, जंतर-मंतर दिल्ली, कोणार्क का सूर्य मंदिर, सांची स्तूप, दक्षिण भारत के विशाल मंदिर, नालंदा विश्वविद्यालय, महाबलीपुरम आदि किसने बनवाए हैं? और भी बहुत कुछ वैभवशाली इमारतें थीं, जिन्हें जिहादी मानसिकता के आक्रांताओं ने ध्वस्त कर दिया। यदि इनको ध्वस्त न किया जाता, तो निश्चित रूप से ये आज तक अपनी भव्यता और स्थापत्य कला का दर्शन करा रही होतीं।

उन्हीं की रचना की तर्ज पर कहना चाहता हूँ:--

क्या-क्या तोड़ा है तुमने जिहादियो, ये कब तुम बतलाओगे ?

काबा की 360 मूर्तियाँ, इस्तांबुल की चर्च हागिया सोफिया, 

ईरान की आतिशगाहें, बामियान की भव्य बुद्ध प्रतिमाएं

मुल्तान का सूर्य मंदिर, कुतुबमीनार परिसर के हिंदू-जैन मंदिर,

सोमनाथ का शिवालय, अयोध्या का राम मंदिर, 

मथुरा का केशवराय मंदिर, काशी का विश्वनाथ मंदिर,

मुल्तान का सूर्य मंदिर, हम्पी का विट्ठल मंदिर 

बोलो क्या-क्या झुठलाओगे?

इमरान प्रतापगढ़ी उन्हीं मुख्यधारा के भारतीय मुस्लिमों की परंपरा से आते हैं, जिन्होंने देश-विभाजन के बाद खुद को "लीगी" से अचानक "कांग्रेसी" घोषित कर दिया था। बदलती परिस्थितियों में इन जिहादियों ने अपनी जमीन-जायदाद और रुतबे को बरकरार रखने के लिए खुद को "सैकुलर" घोषित कर दिया। वास्तव में, सेकुलरिज्म में इनकी कोई सच्ची निष्ठा नहीं थी। इसे तो इन्होंने एक रणनीति के रूप में प्रयोग किया;


और कांग्रेस ने सच्चे सेकुलरिज्म को तिलांजलि देते हुए दशकों तक इनके थोक वोटों के आधार पर सत्ता-सुख को भोगा। लेकिन आज हिंदू इस एक-तरफा सद्भावना से ऊब चुका है। प्रतिक्रियास्वरूप वह संंघ-बीजेपी के पीछे लामबंद हो रहा है। 

दुख की बात यह है कि कांग्रेस आज भी उसी गलती को दुहरा रही है; आज भी इन जिहादी मानसिकता के लोगों को उच्च पदों पर सुशोभित कर रही है; और कुछ भी सीखने को तैयार नहीं है। इसका खामियाजा भारत के हिंदु सैकुलर लोगों को उठाना पड़ रहा है। वे गंभीर दबाव से गुजरते हुए अपने ही परिवारों-रिश्तेदारी में और मित्रों में, हँसी के पात्र बन गये हैं। 

भारत में अजीब तरीके से सेकुलरिज्म मुस्लिम-चाटुकारिता का पर्याय बन चुका है। हद तो तब हो जाती है जब मुस्लिमों का बचाव करते-करते ये कथित लिबरल सैकुलरिस्ट इस्लाम का बचाव करने पर उतारू हो जाते हैं। मानो ये इस्लाम को ओसामा बिन लादेन और जाकिर नायक से भी अधिक जानते हैं। ये इतना भी फर्क नहीं समझते कि विचारधारा अलग चीज है और व्यक्ति अलग। एक नागरिक के नाते नि:संदेह मुसलमानों सहित प्रत्येक भारतीय को सम्मान और सुरक्षित ढंग से जीने का अधिकार प्राप्त है। लेकिन किसी भी विचारधारा की आलोचना की जा सकती है। यह हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन हिंदू-धर्म की कमियाँ गिनाने वाले इस्लाम की बुराइयों पर चुप हो जाते हैं। इससे नाराज होकर हिंदू नौजवान कांग्रेस से और सेकुलरिज्म से दूर होते जा रहे हैं। आज के हिंदू की इस मनोदशा का फायदा उठाते हुए हिंदुवादी ताकतें पूरे देश पर अपनी पकड़ दिनों-दिन और मजबूत करती जा रही हैं; परंतु हम मूकदर्शक बने रहने के अलावा कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं।

मनोज मलिक "ह्यूमनिस्ट" (चंडीगढ़)

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