ये हमारे वैज्ञानिक संस्थान 'इसरो' के प्रमुख हैं ! - नाम है एस. सोमनाथ। इनके अनुसार सारा विज्ञान अंग्रेजों ने हमारे वेदों से कापी मारा है।
अबे ओरिजनल इडियट ! विज्ञान की कमाई खाकर भी धर्म की जुगाली क्यों कर रहा है? संस्कृत अगर कंप्यूटर के लिए सबसे उपयुक्त है तो काहे नहीं बना लिया तुम्हारे ऋषि-मुनियों ने कंप्यूटर? अरे वैज्ञानिकों के नाम पर धब्बे ! हिंदुत्व
वादियों के चमचे ! अपने निजी फायदे के लिए विज्ञान के क्षेत्र में पश्चिम के योगदान को क्यों नकार रहा है? तुम्हारे भौंकने से यह तथ्य बदलने वाला नहीं हैं कि रेल, जहाज, कंप्यूटर, बिजली, बल्ब, रेडियो, भाप इंजिन आदि ज्यादातर आविष्कार पश्चिम के ही नाम हैं। तुम्हें पश्चिम से क्या दिक्कत है? क्या वे लोग मनुष्य नहीं हैं? क्या वे किसी और ग्रह से आए हैं? क्या एडीसन का बल्ब सिर्फ उसके देश में रौशनी देता है? क्या एडवर्ड जेनर का चेचक का टीका सिर्फ उसके देश में ईलाज करता है? क्या गूगल, फेसबुक सिर्फ अमेरिका में चलता है? नहीं, एक आविष्कार पूरी मानवता को लाभ पहुँचाता है। इसलिए विज्ञान को, वैज्ञानिकों को पूर्व-पश्चिम के चश्मे से देखना छोड़ो। हमारे लिए पाइथोगोरस और आर्यभट्ट समान रूप से आदरणीय हैं।
यहाँ हरिशंकर परसाई का व्यंग्य स्मरण हो आता है:- "संघवाले दावा करते हैं कि हिंदू पूर्वजों ने अंतरिक्ष यान बनाया था। अचरज इसी बात का है कि अंतरिक्ष यान बनाने वालों ने साइकिल क्यों न बना ली?"
ऐसे ही सत्ताधीशों के चाटुकार अब चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को अपने पुराणों में ढूँढ़ते हैं और कहते हैं कि हिंदुओं का दशावतार की कथा दरअसल डार्विन की इवोल्यूशन थ्योरी को प्रतिपादित करती है। मतलब डार्विन ने इसी से कापी मारा है। मतलब कुछ भी बक दोगे आप और वही सच हो जाएगा !
अरे महाभारत-काल में टेलीविजन और मिसाइल खोजने वालों ! अगर तुम्हारे पास इतने बड़े-बड़े ब्रह्मास्त्र थे तो बाबर के तोपखाने और अंग्रेजों की बंदूकों के आगे क्यों हार गये?
वैज्ञानिक खोज हो चुकने के बाद अपने ग्रंथों को टटोलने वालो ! तुमने पहले ये क्यों नहीं बताया कि कोरोना आने वाला है और उसका ये ईलाज है?
आखिरी बात, अगर वेदों से विज्ञान आया है तो भैय्या अब भी विज्ञान को आगे बढ़ाओ। अब क्यों विज्ञान-विरोधी रवैया अपना रक्खा है? आयुर्वेद के नाम पर मैडिकल साइंस के विरोध का तंबू क्यों गाड़ रक्खा है? अब भी विज्ञान में बढ़-चढ़कर योगदान करो। या सिर्फ वेद-मंत्र पढ़कर घी फूँकने को ही विज्ञान मान रक्खा है?
मनोज मलिक "ह्यूमनिस्ट"

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