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देश-निंदा में आनंद

 (मेरे फेसबुक मित्र स्वप्न बिश्वास ने भारत के विश्व गुरू के दावे का मजाक उड़ान हुए पोस्ट की:- "एशियाई खेल में विषगुरु देश की स्थिति" इसके साथ पदक-सूची का चित्र था जिसके चीन 161 स्वर्ण पदक जीतकर पहले स्थान पर था। जबकि भारत 15 स्वर्ण पदकों के साथ चौथे स्थान पर था। इस पर मैंने उनको अपना कमेन्ट दिया। प्रस्तुत लेख इसी पर आधारित है)

अभी तो भारत की खेलों में स्थिति काफी सुधरी है। इस बार भारत ने एशियाई खेलों में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। अभी तक 18 स्वर्ण पदक सहित कुल 81 पदक जीत चुका है। कुछ लोग चीन से तुलना करके भारत के "विश्व गुरू" होने पर ओछी टीका-टिप्पणी करने में लगे हुए हैं। चीन ने अभी तक 166 स्वर्ण पदक सहित कुल 304 पदक जीत लिए हैं। वह भारत से बहुत आगे हैं। लेकिन धीरे-धीरे भारत भी उभरती हुई खेल-शक्ति बन रहा है।

यह ठीक है कि भारत अभी भी चीन, जापान, अमेरिका, रूस आदि देशों से बहुत पीछे हैं। अभी भारत को अपने प्रदर्शन में और सुधार करना होगा। लेकिन इसकी शुरुआत हो चुकी है। भारत ने पिछले एशियाई खेल से इस बार अधिक मैडल जीते हैं। 2018 में 15 स्वर्ण पदक सहित कुल 69 पदक जीते थे। इस बार अभी तक 21 स्वर्ण सहित कुल 86 पदक हो गए हैं। अभी और भी पदक मिलने की आशा है। हमें विश्वास है भारत की पदक संख्या इस बार 100 को पार कर जाएगी। हमें जीवन में सदा आशावादी रहना चाहिए। 

इसी तरह टोकियो ओलंपिक 2020 में एक स्वर्ण पदक सहित कुल 7 पदक जीते हैं। यह भी आज तक भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। जबकि रियो ओलंपिक 2016 में शून्य स्वर्ण पदक सहित कुल 2 ही पदक जीते थे। हर कंपनी अपने प्रदर्शन का आकलन अपने पिछले वर्ष /तिमाही के आधार पर ही करती है। 

यह सीधा गणित है। मगर आपको लगता है कि देश-निंदा में ही आनंद आता है शायद। आपकी समस्या क्या है? कभी तो भारत के अच्छे पहलूओं की प्रशंसा भी करना सीखिए!

इसी नकारात्मक नजरिए के कारण भारत में नास्तिक/तर्कशील/मानववादी/कम्युनिस्ट लोग सिमटकर रह गए हैं। पहले से बदनाम होने के बावजूद ये अपनी छवि सुधारने के प्रति गंभीर नहीं हैं। ये ज्यादा समय आलोचना, निंदा में ही लगे रहते हैं। स्वस्थ आलोचना का अपना महत्व होता है। लेकिन ये भूलकर भी कभी देश की अच्छी बातों की चर्चा नहीं करते। इस कारण ये मुख्यधारा के लोगों से कट जाते हैं और अलग-थलग पड़ जाते हैं। देशभक्ति और देश की प्रशंसा का ठेका इन्होंने दक्षिणपंथ को ही सौंप दिया है। ये हर मौके पर देश की निंदा करते हैं और कम्युनिस्ट क्रांति में नाकाम होकर इसी में आनंद ढूँढ़ रहे है। 


हमें अपने देश के खिलाड़ियों पर गर्व महसूस करना चाहिए। इस तरह मजाक उड़ाना तो सही नहीं है। हमारी विचारधारा जो भी हो, लेकिन हमें अपने देश से प्यार होना चाहिए। निःसंदेह हम मानववादी/तर्कशील लोग उग्र राष्ट्रवाद के विरुद्ध होते हैं, लेकिन हम सहज देशभक्ति को हम भी स्वीकार करते हैं। हम जब भी देश से संबंधित बुरे आंकड़ें प्रस्तुत करते हैं, बड़ी पीड़ा और बड़े दुख के साथ प्रस्तुत करते हैं। चाहे ये आँकड़े गरीबी, बेरोजगारी, अनपढ़ता, बीमारियों के हों; चाहे भ्रष्टाचार, भुखमरी, शिक्षा-संस्थानों की रैंकिंग, इंटरनेट की गति, प्रैस की स्वतंत्रता हो। इसके पीछे हमारा आशय सुधार और उन्नति करने का होता है। यह देश की बेहतरी हेतु एक प्रकार का आत्म-मंथन होता है। इसमें व्यंग्य और मजाक का विचार कदापि नहीं होता है। 

     इन बुरे आँकड़ों के लिए हम केवल सरकारी तंत्र को दोषी नहीं समझते, अपितु पूरे समाज को ही दोषी मानते हैं। इसमें हम अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी को भी स्वीकार करते हैं। केवल देश या सरकार की बुराई करके हम बच नहीं सकते हैं। आखिर लोकतंत्र में सरकार कौन चुनता है? आखिर देश किनसे मिलकर बनता है? केवल नदी-नाले, पहाड़, मैदान, खेत आदि से देश नहीं बनता है। याद कीजिए जवाहरलाल नेहरू की भारतमाता की परिभाषा। हममें से ज्यादातर लोग नेहरू जी के मार्ग पर चलने वाले लोग हैं। इसलिए प्रत्येक नागरिक से मिलकर यह देश बनता है, यह हमारा मानना है। इसलिए भारत का एशियाई या ओलंपिक खेलों में प्रदर्शन हमारा, 130 करोड़ लोगों का ही रिपोर्ट कार्ड है। यह केवल नरेंद्र मोदी का रिपोर्ट कार्ड नहीं है। हाँ, मौके की सरकार इसका श्रेय लेती है। ऐसा हर पार्टी की सरकार करती है। इसी तरह उनका "विश्व गुरू" का जुमला भी अतिशयोक्तिपूर्ण है। यह उनकी विचारधारा का अभिन्न अंग है। वे तो इसे बार-बार दोहराते रहने वाले हैं। इसका आशय अपने कोर वोटर समर्थक को बरगलाना होता है। लेकिन हम तो यथार्थवादी प्रैक्टिकल लोग हैं। हमें तो संसार में भारत की असली स्थिति की जानकारी है। लेकिन हमें इसमें रस और आनंद नहीं लेना है बल्कि भारत के प्रदर्शन को सुधारने की भूमिका अपनानी है। भारत को गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार आदि के दलदल से बाहर निकालना है।

हमारा दक्षिणपंथी विचारधारा से जो भी मतभेद हो, लेकिन इस बात पर, भारत की प्रगति, भारत के विकास की बात पर हम सब सहमत होने चाहिएं। 

वो "भारतमाता की जय" बोलने वाले लोग हैं और हम "जय हिन्द" बोलने वाले लोग हैं। सब इस बात पर सहमत होंगे कि इन दोनों जयघोषों का भावार्थ एक ही है। इन दोनों जयघोषों में कोई भी अंतर्विरोध नहीं है। 

इसलिए हम सभी को देशोन्नति हेतु कमर कस लेनी चाहिए। 

जय हिन्द।


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