जनसांख्यिकी किसी देश या प्रदेश की नियति तय करती है। चीन आज अपनी एक बच्चे की नीति पर पछता रहा है। चीन जल्दी ही बूढ़ों का देश बन जाएगा। वहीं भारत लोकतांत्रिक ढंग से परिवार नियोजन को लागू करने का लाभ उठा रहा है। जिस जनसंख्या को हम भारत की सबसे बड़ी समस्या समझ रहे थे, वही आज हमारी सबसे बड़ी ताकत बन गई है।
लेकिन पंजाब के जनसांख्यिकी के आँकड़े चौकाने वाले हैं। खासकर सिक्खों के लिए चिंता को बढ़ाने वाले हैं। सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के अनुसार पंजाब की जनसंख्या वृद्धि दर निरंतर घट रही है।
पंजाब की जनसंख्या वृद्धि दर 2020 में 1.65% रही, जबकि राष्ट्रीय दर 2.98% है। 2001 में भारत की कुल जनसंख्या में पंजाब का हिस्सा 2.37% था, जो अब 2.29% रह गया है।
पंजाब में 2011 में 5.11 लाख बच्चों ने जन्म लिया, लेकिन 2020 में सिर्फ 3.81 बच्चे पैदा हुए। जबकि पड़ोसी राज्य हरियाणा में, जो क्षेत्रफल में पंजाब से छोटा है, 5.91 लाख बच्चे हुए।
इसका प्रमुख कारण है पंजाब की युवा आबादी का कनाडा, अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि देशों में जाना। यह हालत तब है जबकि पंजाब में यूपी-बिहार से प्रवासी मजदूर आकर बस रहे हैं, जो युवा हैं और जन्मदर को गति दे रहे हैं। इसका अर्थ है कि पंजाब में पंजाबियों की जनसंख्या तेजी से कम हो रही है। इसका दीर्घकालिक प्रभाव पंजाब की राजनीति पर भी पड़ेगा। सिक्ख-वर्चस्व धीरे-धीरे कम होता चला जाएगा और खालिस्तान का मुद्दा और कमजोर होगा।
पंजाब में सिक्खों का प्रतिशत अब 59.91 से घटकर 57.69 रह गया है। भारत की आबादी में सिक्खों का हिस्सा जो पहले 1.87% था, वह अब 1.72% रह गया है।
यूपी से मुस्लिम आ-आकर पंजाब में बनने लगे हैं। वे उन मस्जिदों को दुबारा बहाल कर रहे हैं जो 1947 के बाद खंडहर हो गई थीं। इसके अलावा नई-नई मस्जिदें बना रहे हैं।
अभी तो फिलहाल सिक्खों का, पंजाबियों का वर्चस्व कायम है लेकिन निश्चित रूप से, भविष्य में पंजाब के राजनीतिक और सामाजिक समीकरण बदलने वाले हैं। क्योंकि किसी ने सही कहा है कि जनसांख्यिकी आपकी नियति
तय करती है।

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